लखनऊ में 11 जनवरी को उत्तर प्रदेश क्षत्रिय लोक सेवक परिवार महासमिति द्वारा आयोजित क्षत्रिय पुरोधा श्रद्धांजलि समारोह में क्षत्रिय समाज की गौरवशाली परंपरा, शौर्यपूर्ण इतिहास, त्याग, बलिदान और समाज सेवा को भावपूर्ण ढंग से स्मरण किया गया। इस अवसर पर विधान परिषद के सभापति कुंवर मानवेन्द्र सिंह ने कहा कि यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उस वीर परंपरा को नमन करने का क्षण है, जिसने सदियों से राष्ट्र और समाज को दिशा देने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय समाज ने न केवल रणभूमि में मातृभूमि की रक्षा की, बल्कि नीति, मर्यादा, न्याय और कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श भी समाज के सामने प्रस्तुत किया है। उनके त्याग और बलिदान आज भी जीवन के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।सभापति ने स्पष्ट किया कि बहादुरी को किसी जाति या धर्म के बंधन में नहीं बांधा जा सकता। देश का हर नागरिक जो मातृभूमि की रक्षा और अखंडता को बनाए रखने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करता है, वही सच्चे अर्थों में क्षत्रिय है। ऐसे पराक्रमी वीरों को स्मरण करना हम सबका परम कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि महासमिति द्वारा इस तरह के कार्यक्रम की शुरुआत एक अनूठी पहल है, जिससे जहां हम अपने पुरोधाओं को याद करेंगे, वहीं आने वाली पीढ़ियों को भी गौरवशाली अतीत से जोड़ा जा सकेगा। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि क्षत्रिय समाज ने हर कालखंड में लोक सेवक और राष्ट्रनायक की भूमिका निभाते हुए देश को विपदाओं से बचाया और नागरिकों को सुरक्षित वातावरण प्रदान किया।महासमिति के अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह ने कहा कि आज समाज अपने पूर्वजों को भूलता जा रहा है। यदि हम उन्हें याद नहीं करेंगे, तो उनका नाम केवल हमारे ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष की स्मृति से लुप्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को यह जानना आवश्यक है कि वह किन महान पूर्वजों की वंशज है। इसी उद्देश्य से महासमिति ने इस वर्ष से क्षत्रिय पुरोधा श्रद्धांजलि समारोह की परंपरा शुरू की है, जिसके अंतर्गत प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक समाज और राष्ट्र को दिशा देने वाले 25 क्षत्रिय पुरोधाओं को प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि दी जाएगी।
कार्यक्रम में साहित्यकार पद्मश्री विद्याबिन्दु सिंह ने कहा कि पितृ ऋण की परंपरा भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है। पुरोधाओं को स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि देना इतिहास को वर्तमान से जोड़ने का सार्थक प्रयास है, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी अपने पूर्वजों को जान सकेंगी। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, छत्तीसगढ़ की प्रोफेसर लवली शर्मा ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज को नई दिशा देते हैं और ऐसे समारोहों में आमंत्रित होकर वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही हैं। भातखंडे संस्कृत विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर मांडवी सिंह ने कहा कि समर्पण और आध्यात्मिक चेतना से जुड़े हमारे पूर्वजों ने समाज के लिए जो अमूल्य योगदान दिया है, उसे स्मरण करने की यह पहल भविष्य में और भी मजबूत होगी और नई पीढ़ी इतिहास में दर्ज अपने पुरोधाओं को याद रखेगी।महिला कल्याण निगम की अध्यक्ष कमलावती सिंह सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में क्षत्रिय पुरोधाओं द्वारा दिए गए योगदान को विशेष रूप से स्मरण किया गया और उनके वंशजों को सम्मानित किया गया। यूपी कॉलेज वाराणसी के संस्थापक उदय प्रताप सिंह के परिवारीजनों रानी सुभाश्री देवी और प्राचार्य डीके सिंह, आरबीएस कॉलेज आगरा के संस्थापक राजा बलवंत सिंह के परिवारीजन युवराज अंबरीश सिंह और प्रोफेसर विजय श्रीवास्तव, टीडी कॉलेज जौनपुर के संस्थापक तिलकधारी सिंह से जुड़े प्रधानाचार्य डॉक्टर एसपी सिंह तथा इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के संस्थापक वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती सिंह के योगदान को स्मरण करते हुए विश्वविद्यालय की कुलपति लवली शर्मा को सम्मानित किया गया।समिति के शिव शरण सिंह, देवराज सिंह, कार्यक्रम की संयोजक आराधना सिंह, डॉक्टर अनुपमा सिंह, डॉक्टर उर्मिला सिंह, इंजीनियर एसएन सिंह, रीता सिंह, मुसाफिर सिंह और रामनायक सिंह को भी उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में शैलेंद्र सिंह, अनिल त्रिपाठी, विशाल सिंह, रामेंद्र सिंह, कुंवर प्रदीप, राजीव सिंह, जितेंद्र सिंह सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे। एसकेडी अकादमी के संस्थापक एसकेडी सिंह ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।इससे पूर्व समारोह की शुरुआत 25 क्षत्रिय पुरोधाओं के चित्रों पर पुष्पांजलि, दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुई। श्रद्धांजलि पाने वाले पुरोधाओं में ऋषि विश्वामित्र, साध्वी सुलभा, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, भगवान राम, महाराज इक्ष्वाकु, महाराज मांधाता, महाराज भगीरथ, महाराज हरिश्चंद्र, महाराज अग्रसेन, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, रानी दुर्गावती, सम्राट हर्षवर्धन, महाराज सुहेलदेव, वीर कुंवर सिंह, अमर क्रांतिकारी बंधू सिंह, राणा वेणी माधव सिंह बैस, महाराज गंगा सिंह, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, राजा उदय प्रताप सिंह, राजा बलवंत सिंह, तिलकधारी सिंह, राजा युवराज दत्त सिंह और राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह रानी पद्मावती शामिल रहे।
