लखनऊ(आरएनएस ) स्थित बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में 11 जनवरी को तीन दिवसीय विश्वविद्यालय दिवस समारोह के अंतर्गत ‘विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि हेतु सामाजिक परिवर्तन का आह्वान’ विषय पर द्विसत्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानन्द प्रसाद गुप्त, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, अम्बेडकर फाउंडेशन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सदस्य डॉ. चमन लाल बंगा, आयोजन समिति के संयोजक एवं शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही तथा डॉ. बुद्धि सागर गुप्ता प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन तथा महात्मा गौतम बुद्ध और बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। विश्वविद्यालय कुलगीत के पश्चात आयोजन समिति की ओर से अतिथियों का पौधा, स्मृति चिन्ह और अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया। कार्यक्रम संयोजक प्रो. राजशरण शाही ने स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत किया, जबकि मंच संचालन का दायित्व डॉ. बुद्धि सागर गुप्ता ने निभाया।कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने आयोजन समिति को सार्थक और विचारोत्तेजक कार्यक्रम के लिए बधाई देते हुए कहा कि विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने में शिक्षण, अधिगम, शोध और विस्तार गतिविधियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आज विश्व पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव, अवसाद और अशांति जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे समय में समस्त विश्व की आशा भारत की ओर है। इसका प्रमुख कारण भारतीय युवाओं की अपार शक्ति और कार्यक्षमता है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को विकसित राष्ट्र बनने की आधारशिला बताते हुए युवाओं से पर्यावरण संरक्षण में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने, रिड्यूस, रीयूज और रीसायकल के सिद्धांत को अपनाने, स्वदेशी को बढ़ावा देने और ‘वोकल फॉर लोकल’ को सशक्त करने का आह्वान किया। साथ ही युवाओं को नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बनने की प्रेरणा दी।प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानन्द प्रसाद गुप्त ने ‘विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि हेतु सामाजिक परिवर्तन: स्वभाषा की भूमिका’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भाषा और संस्कृति के बिना किसी राष्ट्र का वास्तविक विकास संभव नहीं है। उन्होंने स्वभाषा में कार्य करने और उस पर गर्व करने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, पहचान और मौलिक चिंतन का आधार है। उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चंद्र, राजा राममोहन राय और अज्ञेय जैसे साहित्यकारों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि सांस्कृतिक गुलामी की शुरुआत भाषायी गुलामी से होती है, जिससे समाज सृजनकर्ता के बजाय अनुकरणकर्ता बन जाता है।उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने स्वदेशी और स्वबोध की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दृढ़ संकल्प के बिना चेतना को आलोकित नहीं किया जा सकता। उन्होंने विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों को वास्तविक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए स्वभाषा, स्वकर्तव्य और स्वबोध को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा पर गंभीर कार्य करने और युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।अम्बेडकर फाउंडेशन के सदस्य डॉ. चमन लाल बंगा ने सामाजिक परिवर्तन में समरसता के महत्व पर विचार रखते हुए कहा कि केवल आर्थिक विकास से राष्ट्र का समग्र विकास संभव नहीं है। इसके लिए सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सशक्तिकरण भी आवश्यक है। उन्होंने समरसता को देश की प्राणशक्ति बताते हुए कहा कि जब समाज के सभी वर्ग एकजुट होकर राष्ट्रहित में कार्य करते हैं, तभी समावेशी और संतुलित विकास संभव हो पाता है।संगोष्ठी के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता आयोजन समिति के चेयरपर्सन प्रो. राम चंद्रा ने की। इस सत्र में इतिहासवेत्ता और सामाजिक चिंतक संजय श्री हर्ष, लखनऊ विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ध्रुव सेन सिंह सहित अनेक शिक्षाविद उपस्थित रहे। संजय श्री हर्ष ने कर्तव्य बोध और परिवार प्रबोधन की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा उसकी पारिवारिक व्यवस्था में निहित है, जहाँ से मूल्यबोध और संस्कारों का विकास होता है। प्रो. ध्रुव सेन सिंह ने पर्यावरण को विकास की अनिवार्य शर्त बताते हुए जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने पर बल दिया।कार्यक्रम चेयरपर्सन प्रो. राम चंद्रा ने कहा कि विद्यार्थी ही भविष्य के निर्माता हैं और उन्हें प्रकृति, ज्ञान और संतुलन के मूल मंत्र को आत्मसात करना चाहिए। उन्होंने नई शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान प्रणाली के महत्व को रेखांकित किया। अंत में प्रो. हरिशंकर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय द्वारा 10 से 12 जनवरी तक विश्वविद्यालय दिवस के अवसर पर तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर 12 जनवरी को स्वदेशी संकल्प दौड़ का आयोजन किया जाएगा, साथ ही विद्यार्थियों द्वारा बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी।
