लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से सवाल उठाते हुए कहा है कि जब सरकार और बिजली कर्मियों के सामूहिक प्रयास से हजारों करोड़ रुपये खर्च कर विद्युत वितरण नेटवर्क को सुदृढ़ किया गया है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने का औचित्य क्या है?
समिति ने बताया कि आरडीएसएस योजना के अंतर्गत पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड क्षेत्र में नेटवर्क सुदृढ़ीकरण पर बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। वर्ष 2017 में लगभग 41 प्रतिशत रही एटीएंडसी हानियाँ घटकर अब करीब 15 प्रतिशत तक आ गई हैं, जो सुधारों का प्रत्यक्ष परिणाम है।इसी प्रकार दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रांसमिशन एवं वितरण तंत्र को मजबूत किया गया, जबकि प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना के माध्यम से लाखों उपभोक्ताओं, विशेषकर किसानों और ग्रामीण परिवारों को विद्युत कनेक्शन उपलब्ध कराए गए।
इन प्रयासों से प्रदेश का विद्युत तंत्र पहले की तुलना में अधिक सक्षम और स्थिर हुआ है।संघर्ष समिति ने वर्ष 2026-27 के बजट में विद्युत क्षेत्र के सुधार हेतु 65,926 करोड़ रुपये के प्रावधान पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं वित्त मंत्री सुरेश खन्ना का आभार व्यक्त किया।समिति ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि जब आगामी वित्तीय वर्ष के लिए इतनी बड़ी धनराशि नेटवर्क सुधार हेतु स्वीकृत की गई है और बिजली कर्मी पूरी प्रतिबद्धता से कार्य कर रहे हैं, तो पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के निजीकरण का निर्णय तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए।
संघर्ष समिति का कहना है कि लगातार सुधारों के चलते वितरण कंपनियों की एटीएंडसी हानियाँ घट रही हैं और वित्तीय स्थिति बेहतर हो रही है। बजट प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन के बाद अगले एक वर्ष में प्रदेश की वितरण कंपनियों की एटीएंडसी हानियाँ राष्ट्रीय मानक से नीचे लाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
समिति ने सवाल उठाया कि सरकारी धन से व्यवस्था को मजबूत कर उसे निजी घरानों को सौंपना किस प्रकार का सुधार मॉडल है? इसे जनहित और कर्मचारियों के मनोबल के विरुद्ध बताया गया।अवकाश के दिन भी प्रदेश भर में बिजली कर्मियों ने जनपदों और परियोजनाओं पर व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाकर निजीकरण के विरोध को और तेज करने की रणनीति बनाई।
